शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

मैं शांति से बैठा अख़बार पढ़ रहा था.........मैं असहिष्णु हो गया हूँ......

मैं शांति से बैठा अख़बार पढ़ रहा था, तभी कुछ मच्छरों ने आकर मेरा खून चूसना शुरू कर दिया। स्वाभाविक प्रतिक्रिया में मेरा हाथ उठा और अख़बार से चटाक हो गया और दो-एक मच्छर ढेर हो गए.!!
फिर क्या था उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया कि मैं असहिष्णु हो गया हूँ.!!
मैंने कहा "तुम खून चूसोगे तो मैं मारूंगा.!! इसमें असहिष्णुता की क्या बात है.???"
वो कहने लगे खून चूसना उनकी आज़ादी है.!!
"आज़ादी" शब्द सुनते ही कई बुद्धिजीवी उनके पक्ष में उतर आये और बहस करने लगे.!!
इसके बाद नारेबाजी शुरू हो गई, "कितने मच्छर मारोगे, हर घर से मच्छर निकलेगा"...
बुद्धिजीवियों ने अख़बार में तपते तर्कों के साथ बड़े-बड़े लेख लिखना शुरू कर दिया.!
उनका कहना था कि मच्छर देह पर मौज़ूद तो थे लेकिन खून चूस रहे थे ये कहाँ सिद्ध हुआ है.? और अगर चूस भी रहे थे तो भी ये गलत तो हो सकता है लेकिन 'देहद्रोह' की श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि ये "बच्चे" बहुत ही प्रगतिशील रहे हैं, किसी की भी देह पर बैठ जाना इनका 'सरोकार' रहा है.!!
मैंने कहा मैं अपना खून नहीं चूसने दूंगा बस.!
तो कहने लगे ये "एक्सट्रीम देहप्रेम" है.! तुम कट्टरपंथी हो, डिबेट से भाग रहे हो.!!
मैंने कहा तुम्हारा उदारवाद तुम्हें मेरा खून चूसने की इज़ाज़त नहीं दे सकता.!
इस पर उनका तर्क़ था कि भले ही यह गलत हो लेकिन फिर भी थोड़ा खून चूसने से तुम्हारी मौत तो नहीं हो जाती, लेकिन तुमने मासूम मच्छरों की ज़िन्दगी छीन ली.!"फेयर ट्रायल" का मौका भी नहीं दिया.!
इतने में ही कुछ राजनेता भी आ गए और वो उन मच्छरों को अपने बगीचे की 'बहार' का बेटा बताने लगे.!!
हालात से हैरान और परेशान होकर मैंने कहा कि लेकिन ऐसे ही मच्छरों को खून चूसने देने से मलेरिया हो जाता है, और तुरंत न सही बाद में बीमार और कमज़ोर होकर मौत हो जाती है.!!
इस पर वो कहने लगे कि तुम्हारे पास तर्क़ नहीं हैं इसलिए तुम भविष्य की कल्पनाओं के आधार पर अपने 'फासीवादी' फैसले को ठीक ठहरा रहे
हो..!!
मैंने कहा ये साइंटिफिक तथ्य है कि मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है, मुझे इससे पहले अतीत में भी ये झेलना पड़ा है.!
साइंटिफिक शब्द उन्हें समझ नहीं आया !
तथ्य के जवाब में वो कहने लगे कि मैं इतिहास को मच्छर समाज के प्रति अपनी घृणा का बहाना बना रहा हूँ, जबकि मुझे वर्तमान में जीना चाहिए..!
इतने हंगामें के बाद उन्होंने मेरे ही सर माहौल बिगाड़ने का आरोप भी मढ़ दिया.!!!
मेरे ख़िलाफ़ मेरे कान में घुसकर सारे मच्छर भिन्नाने लगे कि "लेके रहेंगे आज़ादी".!!!
मैं बहस और विवाद में पड़कर परेशान हो गया था., उससे ज़्यादा जितना कि खून चूसे जाने पर हुआ था.!!!
आख़िरकार मुझे तुलसी बाबा याद आये: "सठ सन विनय, कुटिल सन प्रीती...."।
और फिर मैंने काला हिट उठाया और मंडली से मार्च तक, बगीचे से नाले तक उनके हर सॉफिस्टिकेटेड और सीक्रेट ठिकाने पर दे मारा.!!!
एक बार तेजी से भिन्न-भिन्न हुई और फिर सब शांत.!!
उसके बाद से न कोई बहस न कोई विवाद., न कोई आज़ादी न कोई बर्बादी., न कोई क्रांति न कोई सरोकार.!!!
अब सब कुछ ठीक है.!! यही दुनिया की रीत है.!!!

शनिवार, 12 दिसंबर 2015

त्यार-वार

श्री गीता जयन्ती, on 21 December 2015
in 8 days and 06:31 hours.
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मकर संकरात/उत्तरैणी कौतिक, on 15 January 2016
in 33 days and 06:31 hours.
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गणतंत्र दिवस, on 26 January 2016
in 44 days and 06:31 hours.
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मौनी अमावस्या, on 08 February 2016
in 57 days and 06:31 hours.
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बसन्त पंचमी, on 13 February 2016
in 62 days and 06:31 hours.
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माघी पौर्णमासी, on 22 February 2016
in 71 days and 06:31 hours.
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महाशिवरात्रि, on 07 March 2016
in 85 days and 06:31 hours.
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खग्रास सूर्य ग्रहण, on 09 March 2016
in 87 days and 06:31 hours.
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होलिका दहन/पौर्णमासी, on 22 March 2016
in 100 days and 06:31 hours.
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होलिका प्रतिपदा/ छरड़ी, on 24 March 2016
in 102 days and 06:31 hours.
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पं० राम दत्त जोशी- उत्तराखण्ड के महान ज्योतिर्विद

भारत वर्ष में भले ही ग्रिगेरियन कैलेण्डर लोकप्रिय है, लेकिन हर क्षेत्र या सभ्यता के लोग अपने-अपने पंचांग के अनुसार ही शुभ कार्य सम्पन्न करवाते हैं। इसी प्रकार उत्तराखण्ड के कुमाऊं क्षेत्र में सबसे प्रचलित और मान्य पंचांग है “श्री गणेश मार्तण्ड सौरपक्षीय पन्चांग” इसके रचयिता थे स्व० राम दत्त जोशी जी, जिन्होंने आज से १०४ साल पहले इन पंचांग का प्रतिपादन किया था। पेश है इस महान ज्योतिर्विद का परिचय-
राम दत्त जोशी जी का जन्म नैनीताल जिले के भीमताल इलाके के शिलौटी गांव में कुमाऊं के राजा के ज्योतिर्विद पं० हरिदत्त जोशी जी के घर में १८८४ में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई, कुछ समय हल्द्वानी बेलेजली लाज में चलने वाले मिशन स्कूल में भी इनकी शिक्षा हुई। इसके पश्चात आप पीलीभीत स्थित ललित हरि संस्कृत विद्यालय में अध्ययनार्थ पहुंचे। यहां अध्ययन काल में आप पं० द्वारिका प्रसाद चतुर्वेदी और पं० सोमेश्वर दत्त शुक्ल जी के संपर्क में आये। ये विद्वान पुरुष सनातन धर्म के व्याख्याता और प्रचारक थे, आपका भी इस ओर रुझान बढ़ता चला गया। आपने अपने संपर्क पं० ज्वाला प्रसाद मिश्र, स्वामी हंस स्वरुप, पं० गणेश दत्त, पं० दीनदयाल शर्मा जी से भी बढ़ाये, ये लोग सनातन धर्म महासभा के पदाधिकारी थे। इसी दौरान आप आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती, पं० गिरधर शर्मा और पं० अखिलानन्द शर्मा के भी संपर्क में आये और लाहौर, अमृतसर, अलवर, जयपुर सहित पंजाब और राजस्थान के कई छोटे-बड़े शहरों में सम्पन्न शर्म सम्मेलनों को सम्बोधित कर सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया। विक्रमी संवत १९६४ में भारत धर्म महामंडल ने आपको “धर्मोपदेशक” की उपाधि से विभूषित किया। सम्वत १९७३ और १९८३ में इसी संस्था ने आपको “ज्योर्तिभूषण”  और महोपदेशक” की उपाधियों से विभूषित किया।
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रामद्त्त पंचांग
जोशी जी ज्योतिष के सशक्त एवं सिद्धहस्त लेखक थे। अपने जीवन काल में इन्होंने ७ पुस्तकों का प्रणयन किया था, यथा-ज्योतिष चमत्कार समीक्षा, महोपदेशक चरितावली, नवग्रह समीक्षा, प्राचीन हिन्दू रसायन शास्त्र, समय दर्पण, ठन-ठन बाबू और पाखण्ड मत चपेटिये। कुछ काल के लिये अवरुद्ध अपनी कुल परम्परा में पंचांग गणना को स्थिर रखते हुये आपने फिर से विक्रमी संवत १९६३ में “श्री गणेश मार्तण्ड पंचांग” मुंबई से प्रकाशित करवाया। उसके बाद इनका पंचांग कुमाऊं भर में लोकप्रिय हो गया आज भी इनके द्वारा बनाये पंचांग को आम भाषा में “राम दत्त पंचांग”  कहा जाता है। इनके बाद इनके भतीजे स्व० पं० विपिन चन्द्र जोशी द्वारा इस पंचांग को परिवर्धित किया गया और आज १०४ साल बाद भी इनकी पीढी इस पंचांग को प्रतिवर्ष प्रकाशित कराती आ रही है।
कुमाऊं केसरी स्व० बद्री दत्त पाण्डे जी को आपने “”कुमाऊं का इतिहास” लिखने में विशेष सहयोग दिया था, जिसका वर्णन श्री पाण्डे जी ने अपनी पुस्तक में भी किया है। संगीत और रामचरित मानस में आपकी विशेष रुचि थी, १९०६ में आपने भीमताल में रामलीला कमेटी बनाकर वहां पर रामलीला मंचन का कार्य प्रारम्भ करवाया। १९३८ में हल्द्वानी में आपने सनातन धर्म सभा की स्थापना की तथा इस सभा से माध्यम से सनातन धर्म संस्कृत विद्यालय की स्थापना करवाई।
आप घुड़सवारी में भी सिद्धहस्त थे तथा अपने जीवन में नियमितता, अनुशासन, स्वाध्याय और देवार्चन को बहुत महत्व देते थे। फलित ज्योतिष की घोषणाओं के कारण आपको तत्कालीन कई रजवाड़ों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने समय-समय पर सम्मानित भी किया। १९६२ में आपका देहान्त हो गया।
स्रोत- श्री शक्ति प्रसाद सकलानी द्वारा लिखित “उत्तराखण्ड की विभूतियां”