शनिवार, 12 दिसंबर 2015

पं० राम दत्त जोशी- उत्तराखण्ड के महान ज्योतिर्विद

भारत वर्ष में भले ही ग्रिगेरियन कैलेण्डर लोकप्रिय है, लेकिन हर क्षेत्र या सभ्यता के लोग अपने-अपने पंचांग के अनुसार ही शुभ कार्य सम्पन्न करवाते हैं। इसी प्रकार उत्तराखण्ड के कुमाऊं क्षेत्र में सबसे प्रचलित और मान्य पंचांग है “श्री गणेश मार्तण्ड सौरपक्षीय पन्चांग” इसके रचयिता थे स्व० राम दत्त जोशी जी, जिन्होंने आज से १०४ साल पहले इन पंचांग का प्रतिपादन किया था। पेश है इस महान ज्योतिर्विद का परिचय-
राम दत्त जोशी जी का जन्म नैनीताल जिले के भीमताल इलाके के शिलौटी गांव में कुमाऊं के राजा के ज्योतिर्विद पं० हरिदत्त जोशी जी के घर में १८८४ में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई, कुछ समय हल्द्वानी बेलेजली लाज में चलने वाले मिशन स्कूल में भी इनकी शिक्षा हुई। इसके पश्चात आप पीलीभीत स्थित ललित हरि संस्कृत विद्यालय में अध्ययनार्थ पहुंचे। यहां अध्ययन काल में आप पं० द्वारिका प्रसाद चतुर्वेदी और पं० सोमेश्वर दत्त शुक्ल जी के संपर्क में आये। ये विद्वान पुरुष सनातन धर्म के व्याख्याता और प्रचारक थे, आपका भी इस ओर रुझान बढ़ता चला गया। आपने अपने संपर्क पं० ज्वाला प्रसाद मिश्र, स्वामी हंस स्वरुप, पं० गणेश दत्त, पं० दीनदयाल शर्मा जी से भी बढ़ाये, ये लोग सनातन धर्म महासभा के पदाधिकारी थे। इसी दौरान आप आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती, पं० गिरधर शर्मा और पं० अखिलानन्द शर्मा के भी संपर्क में आये और लाहौर, अमृतसर, अलवर, जयपुर सहित पंजाब और राजस्थान के कई छोटे-बड़े शहरों में सम्पन्न शर्म सम्मेलनों को सम्बोधित कर सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया। विक्रमी संवत १९६४ में भारत धर्म महामंडल ने आपको “धर्मोपदेशक” की उपाधि से विभूषित किया। सम्वत १९७३ और १९८३ में इसी संस्था ने आपको “ज्योर्तिभूषण”  और महोपदेशक” की उपाधियों से विभूषित किया।
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रामद्त्त पंचांग
जोशी जी ज्योतिष के सशक्त एवं सिद्धहस्त लेखक थे। अपने जीवन काल में इन्होंने ७ पुस्तकों का प्रणयन किया था, यथा-ज्योतिष चमत्कार समीक्षा, महोपदेशक चरितावली, नवग्रह समीक्षा, प्राचीन हिन्दू रसायन शास्त्र, समय दर्पण, ठन-ठन बाबू और पाखण्ड मत चपेटिये। कुछ काल के लिये अवरुद्ध अपनी कुल परम्परा में पंचांग गणना को स्थिर रखते हुये आपने फिर से विक्रमी संवत १९६३ में “श्री गणेश मार्तण्ड पंचांग” मुंबई से प्रकाशित करवाया। उसके बाद इनका पंचांग कुमाऊं भर में लोकप्रिय हो गया आज भी इनके द्वारा बनाये पंचांग को आम भाषा में “राम दत्त पंचांग”  कहा जाता है। इनके बाद इनके भतीजे स्व० पं० विपिन चन्द्र जोशी द्वारा इस पंचांग को परिवर्धित किया गया और आज १०४ साल बाद भी इनकी पीढी इस पंचांग को प्रतिवर्ष प्रकाशित कराती आ रही है।
कुमाऊं केसरी स्व० बद्री दत्त पाण्डे जी को आपने “”कुमाऊं का इतिहास” लिखने में विशेष सहयोग दिया था, जिसका वर्णन श्री पाण्डे जी ने अपनी पुस्तक में भी किया है। संगीत और रामचरित मानस में आपकी विशेष रुचि थी, १९०६ में आपने भीमताल में रामलीला कमेटी बनाकर वहां पर रामलीला मंचन का कार्य प्रारम्भ करवाया। १९३८ में हल्द्वानी में आपने सनातन धर्म सभा की स्थापना की तथा इस सभा से माध्यम से सनातन धर्म संस्कृत विद्यालय की स्थापना करवाई।
आप घुड़सवारी में भी सिद्धहस्त थे तथा अपने जीवन में नियमितता, अनुशासन, स्वाध्याय और देवार्चन को बहुत महत्व देते थे। फलित ज्योतिष की घोषणाओं के कारण आपको तत्कालीन कई रजवाड़ों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने समय-समय पर सम्मानित भी किया। १९६२ में आपका देहान्त हो गया।
स्रोत- श्री शक्ति प्रसाद सकलानी द्वारा लिखित “उत्तराखण्ड की विभूतियां”